सत्य की राह पर चलना है कठिन - Forum
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सत्य की राह पर चलना है कठिन
AryaDate: Monday, 2011-11-14, 12:03 PM | Message # 1
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ओम्!

यह श्रेय मार्ग क्या होता है?यह हमारे उपनिषदों में बताया गया है।कठोपनिषद में यमाचार्य नचिकेता से श्रेय मर्ग के बारे में बतलाते हैं।वे प्रेय मार्ग के बारे में भी बतलातें हैं।और यह फैसला नचिकेता पर ही रख देते है कि उसे प्रेय मार्ग चाहिये या श्रेय मार्ग।

प्रेय मार्ग:यह वह मार्ग है जिस पर चलते ही सुख मिलता है।किन्तु अन्त में वह महादु:ख में गिर पडता है।कोई व्यक्ति लोभी होता है,कोई विलासी,कोई भ्रष्टाचारी।सब लोग अपनी अपनी राह पर चलते हैं।किन्तु इस मार्ग पर चलने वाले लोग महादु:ख मेंडूब पडते ऐ।विलास में सुख तो है किन्तु आरम्भ में ही है।अन्त में दु:ख ही दु:ख मिलता है।जैसे वीर्य स्खैत करके अभी तो आनन्द मिल जायेगा लेकिन बाद में शरीर रुग्ण होकर बहुत दु:ख देवेगा।अत:मुझे तो यह प्रेय मार्ग बडा ही खराब लगा।और इस मार्ग परचलने वाले की मुक्ति कभी नहीं होती है।यह मार्ग भोग विलास वाला मार्ग है।

श्रेय मार्ग:यह वह मार्ग है जिसमें शुरुआत में दु:ख झेलना पडता है किन्तु अन्त में महासुख मिलता है।इस पर चलने से व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त हो जाता है।भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में अनेक दु:ख उठाये किन्तु अन्त में उन्हें मोक्ष ही प्राप्त हुआ था।हमारे ऋषि मुनि सब अपने जीवन में कष्ट उठाये किन्तु अन्त में सब मोक्ष को प्रप्त हुए।अब वे कम से कम १० नील वर्शो तक महासुख में रहेंगें।यह वह मार है जिस पर चलके वीर पुरुष अपने देश के लिये कुर्बान हो जाते है।यह वह मार्ग है जिस पर महर्षि दयानन्द चले थे।उन्हें बहुत भयन्कर दु:ख उठाना पडा था।आप उनकी जीवनी पढिये।किन्तु अन्त में उन्हें सुख ही मिला।

इस श्रेय मार्ग पर अनेक बाधाएं आती हैं।इस पर चलते-चलते मनुष्य मृत्यु से अमरत्व को प्राप्त हो जाता है।अर्थात मनुष्य इस पर चलकर मौत के मूँह में तो चला जाता है किन्तु इससे ही वह मोक्ष अर्थात स्वर्ग में चला जाता है।यही मनुष्य का असली मार्ग होना चाहिये।प्रेय मार्ग पर चलने में बहुत कम सुख है किन्तु श्रेय मार्ग में बहुत सुख है।ब्रह्म्चर्य,सत्यादि व्रतों का पालन करना कोई आसान कार्य नहीं है।किन्तु कुच्ह समय बाद इस पर चलने में बहुत आनन्द प्राप्त होता है।

जिस ने श्रेय या सत्य मार्ग पर चलना सीख लिया है उसके लिये दु:ख तुच्च्ह सी वस्तु है।इस मार्ग पर चलने के लिये अत्यन्त पुरुषार्थ,दृढ निश्चय की आवश्यकता पडती है।इस मार्ग पर चलने वाले अधिकतर लोग बीच में ही हिम्मत हार जाते हैं।किन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि यह मार्ग असम्भव है।इस मार्ग पर चलते रहो चलते रहो।यह मार्ग धर्म का मार्ग है।यदि इस मार्ग पर चलना है तो धर्म के दश लक्षण याद करके उनका कठोरता पूर्वक पालन करना चाहिये।योगाङो का कडा से कडा अनुश्ठान करना चाहिये तभी मुक्ति सम्भव है अन्यथा नही।कभी भी हार न मानें।
"चरैवेति चरैवेति"

धन्यवाद!

विनय आर्य


Message edited by Arya - Monday, 2011-11-14, 3:20 PM
 
AryaveerDate: Monday, 2011-11-14, 2:33 PM | Message # 2
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AryaDate: Monday, 2011-11-14, 3:19 PM | Message # 3
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Dhanyavad!
 
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