आज का आर्यसमाजी (मा. धर्म‌वीर डायरी) - Forum
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आज का आर्यसमाजी (मा. धर्म‌वीर डायरी)
shubham123Date: Friday, 2011-11-11, 9:10 PM | Message # 1
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आज का आर्यसमाजी :


जिन्हें संसार में संसार का उपकार करना था,
जिन्हें दुनियां में वैदिक धर्म का विस्तार करना था,
अनाथों और अछूतों का जिन्हें उद्धार करना था,
जिन्हें निज देश और जाति का बेड़ा पार करना था,

उन्हें देखो तो बाहम बरसरे पैकार बैठें हैं |
समाजों को मिटाने के लिए तैयार बैठे हैं ||

सभाओं में संगठन के जो गीत गाते हैं,
बड़े सरमन सुनाते हैं, बड़ी बातें बनाते हैं,
खुदाई का जो खुद को बेगरज़ ख़ादिम बताते हैं,
जो उनके दिल टटोलो तो खुदी से स्याह पाते हैं,

यही लीडर रहे तो हो चुका उद्धार वेदों का |
इन्हें तो खून करना है दयानन्द की उम्मीदों का ||

ज़माना रश्क करता था कभी वह प्यार था हम में,
हरेक हर दूसरे का मुनीसो ग़मख्वार था हम में,
धर्म पर जान देने को हर इक तैय्यार था हम में,
बला का जोश था और जज्बये ईसार था हम में,

मगर अब आर्यों में नाम को उलफ़त नहीं पाती |
न वह श्रद्धा, न वह भक्ति, कहीं हिम्मत नहीं पाती ||

निकलते थे जो हम शानों पै वेदों के अलम रक कर,
फ़रिश्ते भी फिदा होते थे उस पुरजोश‌ मंजर पर,
जला देते थे हम दुश्मन के ख़िरमन को कलम रख कर,
हटाते ही न थे पीछे कभी आगे कदम रख कर,

नमस्ते लब पै आते ही मुखालिफ चौंक पड़ते थे |
समाजी नाम से पाखंडियों के होश उड़ते थे ||

समाजों की मगर अब रात दिन तहकीर होती है,
रवां गर्दन पै रोज अग़यार की शमशीर होती है,
न वह तहरीर होती है, न वह तकरीर होती है,
जो होती है तो हर इक बात बेतासीर होती है ,

न वह लेखक रहे हम में, न वह तक्रार बाकी है |
कि इस गुलशन के ग़ुल मुरझा गये अब खार बाकी है ||

ऋषि किस्मत से फिर इक बार गर भारत में आ जाये,
रुखे अनवर "मुसाफिर" आके फिर इकबार दिखलाये,
हमारे दम्भ को देखें और इस आचार पर जायें,
तो सच कहता हुँ गैरत से बिना ही मौत मर जाय्र्,

पदों की लालसा में रोज लड़ते और लड़ाते हैं |
अदायें शासकों की हैं, मगर सेवक कहाते हैं ||

उठो अब आर्य वीरो । फिर से अपना संगठन करके,
समाजों को बचाओ, फूट से कोई जतन करके,
मिटाओ ढोंग और पाखण्ड को भगवत भजन करके,
बजादो वेद का डंका, फिदा जां और तन करके,

तुम्हे‍ जेबा नहीं हरग़िज भी इस हालत में घबराना |
जो तुम चाहो तो कुछ मुश्किल नहीं बिगड़ी का बन जाना ||

(मास्टर धर्मवीर, 102 जे.पी.कालोनी, संगरूर 148001 की डायरी से साभार)
प्रेषक: राजेन्द्र आर्य‌
 
AryaDate: Saturday, 2011-11-12, 7:53 AM | Message # 2
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OM!
We should not be dependent on other Aryas thinking that they will contribute to it.We should remember "charaiveti charaiveti" even if nobody is with us.
Thank you!
 
AryaveerDate: Saturday, 2011-11-12, 3:34 PM | Message # 3
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yes i will keep on adding the content to it from all arya samaj sites i find on internet!

charaiveti charaiveti .... yehi to mantra hai apna! smile
 
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